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समास

 Vikas Kumar Singh     April 26, 2020     Hindi Grammer     No comments   

                                      


     

     एक पद को दूसरे पद के पास सम्यक रूप से जोड़ना ,मिलाना ,मिश्रण करना,

             एक  समर्थ पद को दूसरे समर्थ पद के साथ जोड़ना या लिखना एक जाति के साथ उसी जाति के सब्द                को मिलाना ,

परिभाषा -  समसन समासः 

समास का मतलब है संक्षिप्तीकरण। दो या दो से अधिक शब्द मिलकर एक नया एवं सार्थक शब्द की रचना करते हैं। यह नया शब्द ही समास कहलाता है।
यानी कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक अर्थ को प्रकट किया जा सके वही समास होता है।
दो या दो से अधिक पदों के मध्य आये हुए और विभक्ति अथवा या आदि इत्यादि का लोप  करके जो समास पद बनाया जाता है वह  समास है ,

समास की विशेषता -:


  • समास की जो परिभाषा दी जाती है की समास  में विभक्ति  करके समास बनाया जाता है तो यह परिभाषा  अपूर्ण है क्योकि समास पद आधारित केवल तत्पुरुष समास है,

  • आदि का प्रयोग हमेशा सजीव के साथ और इत्यदि का प्रयोग हमेशा निर्जीव के साथ होना चाहिए,


  • समास में योजक चिन्ह होता है लेकिन बिना योजक चिह्न के समास हो ऐसा  नहीं होता है। 

  • किसी  भी  समस्त पद में समास का होना  उसके विग्रह  और उसके वाक्य में प्रयोग के आधार पर निर्भर  करता  है  

समास के उदाहरण -

    1. कमल के सामान चरण : चरणकमल
    2. रसोई के लिए घर : रसोईघर
    3. घोड़े पर सवार : घुड़सवार
    4. देश का भक्त : देशभक्त
    • सामासिक शब्द या समस्तपद : जो शब्द समास के नियमों से बनता है वह सामासिक शब्द या समस्तपद कहलाता है।
    • पूर्वपद एवं उत्तरपद : सामासिक शब्द के पहले पद को पूर्व पद कहते हैं एवं दुसरे या आखिरी पद को उत्तर पद कहते हैं।

    समास के प्रकार :-

    समास के छः भेद होते है :
    1. तत्पुरुष समास
    2. अव्ययीभाव समास
    3. कर्मधारय समास
    4. द्विगु समास
    5. द्वंद्व समास
    6. बहुव्रीहि समास

    1. तत्पुरुष समास :

    जिस समास में उत्तरपद प्रधान होता है एवं पूर्वपद गौण होता है वह समास तत्पुरुष समास कहलाता है। जैसे:
    • धर्म का ग्रन्थ : धर्मग्रन्थ
    • राजा का कुमार : राजकुमार
    • तुलसीदासकृत : तुलसीदास द्वारा कृत

    तत्पुरुष समास के प्रकार :

     1. कर्म तत्पुरुष समास क्या होता है :- 

    इसमें दो पदों के बीच में कर्मकारक छिपा हुआ होता है। कर्मकारक का चिन्ह ‘को’ होता है। ‘को’ को कर्मकारक की विभक्ति भी कहा जाता है। उसे कर्म तत्पुरुष समास कहते हैं।
    जैसे :-
    • रथचालक = रथ को चलने वाला
    • ग्रामगत = ग्राम को गया हुआ
    • माखनचोर =माखन को चुराने वाला
    • वनगमन =वन को गमन
    • मुंहतोड़ = मुंह को तोड़ने वाला
    • स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त
    • देशगत = देश को गया हुआ
    • जनप्रिय = जन को प्रिय
    • मरणासन्न = मरण को आसन्न
    • गिरहकट = गिरह को काटने वाला
    • कुंभकार = कुंभ को बनाने वाला
    • गृहागत = गृह को आगत
    • कठफोड़वा = कांठ को फोड़ने वाला
    • शत्रुघ्न = शत्रु को मारने वाला
    • गिरिधर = गिरी को धारण करने वाला
    • मनोहर = मन को हरने वाला
    • यशप्राप्त = यश को प्राप्त
    2. करण तत्पुरुष समास क्या होता है :- 
    जैसे :-
    • स्वरचित = स्व द्वारा रचित
    • मनचाहा = मन से चाहा
    • शोकग्रस्त = शोक से ग्रस्त
    • भुखमरी = भूख से मरी
    • धनहीन = धन से हीन
    • बाणाहत = बाण से आहत
    • ज्वरग्रस्त = ज्वर से ग्रस्त
    • मदांध = मद से अँधा
    • रसभरा = रस से भरा
    • आचारकुशल = आचार से कुशल
    • भयाकुल = भय से आकुल
    • आँखोंदेखी = आँखों से देखी
    • तुलसीकृत = तुलसी द्वारा रचित
    • रोगातुर = रोग से आतुर
    • पर्णकुटीर = पर्ण से बनी कुटीर
    • कर्मवीर = कर्म से वीर
    • रक्तरंजित = रक्त से रंजित
    • जलाभिषेक = जल से अभिषेक
    • रोगग्रस्त = रोग से ग्रस्त
    • गुणयुक्त = गुणों से युक्त
    • अंधकारयुक्त = अंधकार से युक्त
    3. सम्प्रदान तत्पुरुष समास क्या होता है :-
     इसमें दो पदों के बीच सम्प्रदान कारक छिपा होता है। सम्प्रदान कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘के लिए’ होती है। उसे सम्प्रदान तत्पुरुष समास कहते हैं।
    जैसे :-
    • विद्यालय = विद्या के लिए आलय
    • रसोईघर = रसोई के लिए घर
    • सभाभवन = सभा के लिए भवन
    • विश्रामगृह = विश्राम के लिए गृह
    • गुरुदक्षिणा = गुरु के लिए दक्षिणा
    • प्रयोगशाला = प्रयोग के लिए शाला
    • देशभक्ति = देश के लिए भक्ति
    • स्नानघर = स्नान के लिए घर
    • सत्यागृह = सत्य के लिए आग्रह
    • यज्ञशाला = यज्ञ के लिए शाला
    • डाकगाड़ी = डाक के लिए गाड़ी
    • देवालय = देव के लिए आलय
    • गौशाला = गौ के लिए शाला
    • युद्धभूमि = युद्ध के लिए भूमि
    • हथकड़ी = हाथ के लिए कड़ी
    • धर्मशाला = धर्म के लिए शाला
    • पुस्तकालय = पुस्तक के लिए आलय
    • राहखर्च = राह के लिए खर्च
    • परीक्षा भवन = परीक्षा के लिए भवन
    4. अपादान तत्पुरुष समास क्या होता है :- 


    इसमें दो पदों के बीच में अपादान कारक छिपा होता है। अपादान कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘से अलग’ होता है। उसे अपादान तत्पुरुष समास कहते हैं।
    जैसे :-
    • कामचोर = काम से जी चुराने वाला
    • दूरागत = दूर से आगत
    • रणविमुख = रण से विमुख
    • नेत्रहीन = नेत्र से हीन
    • पापमुक्त = पाप से मुक्त
    • देशनिकाला = देश से निकाला
    • पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट
    • पदच्युत = पद से च्युत
    • जन्मरोगी = जन्म से रोगी
    • रोगमुक्त = रोग से मुक्त
    • जन्मांध = जन्म से अँधा
    • कर्महीन = कर्म से हीन
    • वनरहित = वन से रहित
    • अन्नहीन = अन्न से हीन
    • जलहीन = जल से हीन
    • गुणहीन = गुण से हीन
    • फलहीन = फल से हीन
    • भयभीत = भय से डरा हुआ
    5. सम्बन्ध तत्पुरुष समास क्या होता है :-
     इसमें दो पदों के बीच में सम्बन्ध कारक छिपा होता है। सम्बन्ध कारक के चिन्ह या विभक्ति ‘का’, ‘के’, ‘की’होती हैं। उसे सम्बन्ध तत्पुरुष समास कहते हैं।
    जैसे :-
    • राजपुत्र = राजा का पुत्र
    • गंगाजल = गंगा का जल
    • लोकतंत्र = लोक का तंत्र
    • दुर्वादल = दुर्व का दल
    • देवपूजा = देव की पूजा
    • आमवृक्ष = आम का वृक्ष
    • राजकुमारी = राज की कुमारी
    • जलधारा = जल की धारा
    • राजनीति = राजा की नीति
    • सुखयोग = सुख का योग
    • मूर्तिपूजा = मूर्ति की पूजा
    • श्रधकण = श्रधा के कण
    • शिवालय = शिव का आलय
    • देशरक्षा = देश की रक्षा
    • सीमारेखा = सीमा की रेखा
    • जलयान = जल का यान
    • कार्यकर्ता = कार्य का करता
    • सेनापति = सेना का पति
    • कन्यादान = कन्या का दान
    • गृहस्वामी = गृह का स्वामी
    • पराधीन – पर के अधीन
    • आनंदाश्रम = आनन्द का आश्रम
    • राजाज्ञा = राजा की आज्ञा
    6. अधिकरण तत्पुरुष समास क्या होता है :- इ
    समें दो पदों के बीच अधिकरण कारक छिपा होता है। अधिकरण कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘में’, ‘पर’ होता है। उसे अधिकरण तत्पुरुष समास कहते हैं।
    जैसे :-
    • कार्य कुशल = कार्य में कुशल
    • वनवास = वन में वास
    • ईस्वरभक्ति = ईस्वर में भक्ति
    • आत्मविश्वास = आत्मा पर विश्वास
    • दीनदयाल = दीनों पर दयाल
    • दानवीर = दान देने में वीर
    • आचारनिपुण = आचार में निपुण
    • जलमग्न = जल में मग्न
    • सिरदर्द = सिर में दर्द
    • क्लाकुशल = कला में कुशल
    • शरणागत = शरण में आगत
    • आनन्दमग्न = आनन्द में मग्न
    • आपबीती = आप पर बीती
    • नगरवास = नगर में वास
    • रणधीर = रण में धीर
    • क्षणभंगुर = क्षण में भंगुर
    • पुरुषोत्तम = पुरुषों में उत्तम
    • लोकप्रिय = लोक में प्रिय
    • गृहप्रवेश = गृह में प्रवेश
    • युधिष्ठिर = युद्ध में स्थिर
    • शोकमग्न = शोक में मग्न
    • धर्मवीर = धर्म में वीर
    जहाँ पर पहले पद में करण कारक का बोध होता है। इसमें दो पदों के बीच करण कारक छिपा होता है। करण कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘के द्वारा’ और ‘से’ होता है। उसे करण तत्पुरुष कहते हैं।

    2. अव्ययीभाव समास :

    वह समास जिसका पहला पद अव्यय हो एवं उसके संयोग से समस्तपद भी अव्यय बन जाए, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। अव्ययीभाव समास में पूर्वपद प्रधान होता है।
    ऐसा समस्त पद जिसका पहला उपसर्ग  हो  वहाँ  पर अव्ययीभाव समास होता है
    अव्यय : जिन शब्दों पर लिंग, कारक, काल आदि शब्दों से भी कोई प्रभाव न हो जो अपरिवर्तित रहें वे शब्द अव्यय कहलाते हैं। अव्ययीभाव समास की पहचान _:अव्ययीभाव समास के पहले पद में अनु, आ, प्रति, यथा, भर, हर,तथा ,यावत,तावत  भर ,हर, अनूप, प्रति, वि, अति,बे ब,ला,   आदि आते हैं। जैसे:
    • आजन्म: जन्म से लेकर
    • यथामति : मति के अनुसार
    • प्रतिदिन : दिन-दिन
    • यथाशक्ति : शक्ति के अनुसार आदि।

    किसी पद का नाम पद हो +उत्तर  पद (अनुसार हो , भर हो, पूर्वक हो, उपरान्त  हो ,) अव्ययी  भाव समास कहना चाहिए ,अवसरानुसार , योग्यतानुसार,दीनार्थ ,विवेकपूर्वक , 

     3-कर्मधारय समास
    3. कर्मधारय समास क्या होता है :- इस समास का उत्तर पद प्रधान होता है। इस समास में विशेषण-विशेष्य और उपमेय-उपमान से मिलकर बनते हैं उसे कर्मधारय समास कहते हैं।
    जैसे :-
    • चरणकमल = कमल के समान चरण
    • नीलगगन = नीला है जो गगन
    • चन्द्रमुख = चन्द्र जैसा मुख
    • पीताम्बर = पीत है जो अम्बर
    • महात्मा = महान है जो आत्मा
    • लालमणि = लाल है जो मणि
    • महादेव = महान है जो देव
    • देहलता = देह रूपी लता
    • नवयुवक = नव है जो युवक
    • अधमरा = आधा है जो मरा
    • प्राणप्रिय = प्राणों से प्रिय
    • श्यामसुंदर = श्याम जो सुंदर है
    • नीलकंठ = नीला है जो कंठ
    • महापुरुष = महान है जो पुरुष
    • नरसिंह = नर में सिंह के समान
    • कनकलता = कनक की सी लता
    • नीलकमल = नीला है जो कमल
    • परमानन्द = परम है जो आनंद
    • सज्जन = सत् है जो जन
    • कमलनयन = कमल के समान नयन
    कर्मधारय समास के भेद :-
    1. विशेषणपूर्वपद कर्मधारय समास
    2. विशेष्यपूर्वपद कर्मधारय समास
    3. विशेषणोंभयपद कर्मधारय समास
    4. विशेष्योभयपद कर्मधारय समास


    1. विशेषणपूर्वपद कर्मधारय समास :- जहाँ पर पहला पद प्रधान होता है वहाँ पर विशेषणपूर्वपद कर्मधारय समास होता है।
    जैसे :-
    • नीलीगाय = नीलगाय
    • पीत अम्बर = पीताम्बर
    • प्रिय सखा = प्रियसखा
    2. विशेष्यपूर्वपद कर्मधारय समास :- इसमें पहला पद विशेष्य होता है और इस प्रकार के सामासिक पद ज्यादातर संस्कृत में मिलते हैं।
    जैसे :- कुमारी श्रमणा = कुमारश्रमणा
    3. विशेषणोंभयपद कर्मधारय समास :- इसमें दोनों पद विशेषण होते हैं।
    जैसे :- नील – पीत, सुनी – अनसुनी, कहनी – अनकहनी
    4. विशेष्योभयपद कर्मधारय समास :- इसमें दोनों पद विशेष्य होते है।
    जैसे :- आमगाछ, वायस-दम्पति।
    4-द्विगु समास -
    4. द्विगु समास क्या होता है :- द्विगु समास में पूर्वपद संख्यावाचक होता है और कभी-कभी उत्तरपद भी संख्यावाचक होता हुआ देखा जा सकता है। इस समास में प्रयुक्त संख्या किसी समूह को दर्शाती है किसी अर्थ को नहीं। इससे समूह और समाहार का बोध होता है। उसे द्विगु समास कहते हैं।
    जैसे :-
    • नवग्रह = नौ ग्रहों का समूह
    • दोपहर = दो पहरों का समाहार
    • त्रिवेणी = तीन वेणियों का समूह
    • पंचतन्त्र = पांच तंत्रों का समूह
    • त्रिलोक = तीन लोकों का समाहार
    • शताब्दी = सौ अब्दों का समूह
    • पंसेरी = पांच सेरों का समूह
    • सतसई = सात सौ पदों का समूह
    • चौगुनी = चार गुनी
    • त्रिभुज = तीन भुजाओं का समाहार
    • चौमासा = चार मासों का समूह
    • नवरात्र = नौ रात्रियों का समूह
    • अठन्नी = आठ आनों का समूह
    • सप्तऋषि = सात ऋषियों का समूह
    • त्रिकोण = तीन कोणों का समाहार
    • सप्ताह = सात दिनों का समूह
    • तिरंगा = तीन रंगों का समूह
    • चतुर्वेद = चार वेदों का समाहार
    द्विगु समास के भेद :-
    1. समाहारद्विगु समास
    2. उत्तरपदप्रधानद्विगु समास
    1. समाहारद्विगु समास :- समाहार का मतलब होता है समुदाय, इकट्ठा होना, समेटना उसे समाहारद्विगु समास कहते हैं।
    जैसे :-
    • तीन लोकों का समाहार = त्रिलोक
    • पाँचों वटों का समाहार = पंचवटी
    • तीन भुवनों का समाहार = त्रिभुवन
    2. उत्तरपदप्रधानद्विगु समास :- उत्तरपदप्रधानद्विगु समास दो प्रकार के होते हैं।
    (1) बेटा या फिर उत्पत्र के अर्थ में।
    जैसे :-
    दो माँ का =दुमाता
    दो सूतों के मेल का = दुसूती।
    (2) जहाँ पर सच में उत्तरपद पर जोर दिया जाता है।
    जैसे :-
    पांच प्रमाण = पंचप्रमाण
    पांच हत्थड = पंचहत्थड
    5-  द्वंद्व समास-:
    5. द्वंद्व समास क्या होता है :- इस समास में दोनों पद ही प्रधान होते हैं इसमें किसी भी पद का गौण नहीं होता है। ये दोनों पद एक-दूसरे पद के विलोम होते हैं लेकिन ये हमेशा नहीं होता है। इसका विग्रह करने पर और, अथवा, या, एवं का प्रयोग होता है उसे द्वंद्व समास कहते हैं।
    जैसे :-
    • जलवायु = जल और वायु
    • अपना-पराया = अपना या पराया
    • पाप-पुण्य = पाप और पुण्य
    • राधा-कृष्ण = राधा और कृष्ण
    • अन्न-जल = अन्न और जल
    • नर-नारी = नर और नारी
    • गुण-दोष = गुण और दोष
    • देश-विदेश = देश और विदेश
    • अमीर-गरीब = अमीर और गरीब
    • नदी-नाले = नदी और नाले
    • धन-दौलत = धन और दौलत
    • सुख-दुःख = सुख और दुःख
    • आगे-पीछे = आगे और पीछे
    • ऊँच-नीच = ऊँच और नीच
    • आग-पानी = आग और पानी
    • मार-पीट = मारपीट
    • राजा-प्रजा = राजा और प्रजा
    • ठंडा-गर्म = ठंडा या गर्म
    • माता-पिता = माता और पिता
    • दिन-रात = दिन और रात
    • भाई-बहन = भाई और बहन
    द्वंद्व समास के भेद :-
    1. इतरेतरद्वंद्व समास
    2. समाहारद्वंद्व समास
    3. वैकल्पिकद्वंद्व समास
    1. इतरेतरद्वंद्व समास :- वो द्वंद्व जिसमें और शब्द से भी पद जुड़े होते हैं और अलग अस्तित्व रखते हों उसे इतरेतर द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास से जो पद बनते हैं वो हमेशा बहुवचन में प्रयोग होते हैं क्योंकि वे दो या दो से अधिक पदों से मिलकर बने होते हैं।
    जैसे :-
    • राम और कृष्ण = राम-कृष्ण
    • माँ और बाप = माँ-बाप
    • अमीर और गरीब = अमीर-गरीब
    • गाय और बैल = गाय-बैल
    • ऋषि और मुनि = ऋषि-मुनि
    • बेटा और बेटी = बेटा-बेटी
    2. समाहारद्वंद्व समास :- समाहार का अर्थ होता है समूह। जब द्वंद्व समास के दोनों पद और समुच्चयबोधक से जुड़ा होने पर भी अलग-अलग अस्तिव नहीं रखकर समूह का बोध कराते हैं, तब वह समाहारद्वंद्व समास कहलाता है। इस समास में दो पदों के अलावा तीसरा पद भी छुपा होता है और अपने अर्थ का बोध अप्रत्यक्ष रूप से कराते हैं।
    जैसे :-
    • दालरोटी = दाल और रोटी
    • हाथपॉंव = हाथ और पॉंव
    • आहारनिंद्रा = आहार और निंद्रा
    3. वैकल्पिक द्वंद्व समास :- इस द्वंद्व समास में दो पदों के बीच में या, अथवा आदि विकल्पसूचक अव्यय छिपे होते हैं उसे वैकल्पिक द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास में ज्यादा से ज्यादा दो विपरीतार्थक शब्दों का योग होता है।
    जैसे :-
    • पाप-पुण्य = पाप या पुण्य
    • भला-बुरा = भला या बुरा
    • थोडा-बहुत = थोडा या बहुत
    • 6- बहुब्रीहि समास -:

    • 6. बहुब्रीहि समास क्या होता है :- 
      जैसे :-
      • गजानन = गज का आनन है जिसका (गणेश)
      • त्रिनेत्र = तीन नेत्र हैं जिसके (शिव)
      • नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका (शिव)
      • लम्बोदर = लम्बा है उदर जिसका (गणेश)
      • दशानन = दश हैं आनन जिसके (रावण)
      • चतुर्भुज = चार भुजाओं वाला (विष्णु)
      • पीताम्बर = पीले हैं वस्त्र जिसके (कृष्ण)
      • चक्रधर= चक्र को धारण करने वाला (विष्णु)
      • वीणापाणी = वीणा है जिसके हाथ में (सरस्वती)
      • स्वेताम्बर = सफेद वस्त्रों वाली (सरस्वती)
      • सुलोचना = सुंदर हैं लोचन जिसके (मेघनाद की पत्नी)
      • दुरात्मा = बुरी आत्मा वाला (दुष्ट)
      • घनश्याम = घन के समान है जो (श्री कृष्ण)
      • मृत्युंजय = मृत्यु को जीतने वाला (शिव)
      • निशाचर = निशा में विचरण करने वाला (राक्षस)
      • गिरिधर = गिरी को धारण करने वाला (कृष्ण)
      • पंकज = पंक में जो पैदा हुआ (कमल)
      • त्रिलोचन = तीन है लोचन जिसके (शिव)
      • विषधर = विष को धारण करने वाला (सर्प)
      बहुब्रीहि समास के भेद :-
      1. समानाधिकरण बहुब्रीहि समास
      2. व्यधिकरण बहुब्रीहि समास
      3. तुल्ययोग बहुब्रीहि समास
      4. व्यतिहार बहुब्रीहि समास
      5. प्रादी बहुब्रीहि समास
      1. समानाधिकरण बहुब्रीहि समास :- इसमें सभी पद कर्ता कारक की विभक्ति के होते हैं लेकिन समस्त पद के द्वारा जो अन्य उक्त होता है, वो कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध, अधिकरण आदि विभक्तियों में भी उक्त हो जाता है उसे समानाधिकरण बहुब्रीहि समास कहते हैं।
      जैसे :-
      • प्राप्त है उदक जिसको = प्रप्तोद्क
      • जीती गई इन्द्रियां हैं जिसके द्वारा = जितेंद्रियाँ
      • दत्त है भोजन जिसके लिए = दत्तभोजन
      • निर्गत है धन जिससे = निर्धन
      • नेक है नाम जिसका = नेकनाम
      • सात है खण्ड जिसमें = सतखंडा
      2. व्यधिकरण बहुब्रीहि समास :- समानाधिकरण बहुब्रीहि समास में दोनों पद कर्ता कारक की विभक्ति के होते हैं लेकिन यहाँ पहला पद तो कर्ता कारक की विभक्ति का होता है लेकिन बाद वाला पद सम्बन्ध या फिर अधिकरण कारक का होता है उसे व्यधिकरण बहुब्रीहि समास कहते हैं।
      जैसे :-
      • शूल है पाणी में जिसके = शूलपाणी
      • वीणा है पाणी में जिसके = वीणापाणी
      3. तुल्ययोग बहुब्रीहि समास :- जिसमें पहला पद ‘सह’ होता है वह तुल्ययोग बहुब्रीहि समास कहलाता है। इसे सहबहुब्रीहि समास भी कहती हैं। सह का अर्थ होता है साथ और समास होने की वजह से सह के स्थान पर केवल स रह जाता है।
      इस समास में इस बात पर ध्यान दिया जाता है की विग्रह करते समय जो सह दूसरा वाला शब्द प्रतीत हो वो समास में पहला हो जाता है।
      जैसे :-
      • जो बल के साथ है = सबल
      • जो देह के साथ है = सदेह
      • जो परिवार के साथ है = सपरिवार
      4. व्यतिहार बहुब्रीहि समास :- जिससे घात या प्रतिघात की सुचना मिले उसे व्यतिहार बहुब्रीहि समास कहते हैं। इस समास में यह प्रतीत होता है की ‘इस चीज से और उस चीज से लड़ाई हुई।
      जैसे :-
      मुक्के-मुक्के से जो लड़ाई हुई = मुक्का-मुक्की
      बातों-बातों से जो लड़ाई हुई = बाताबाती
      5. प्रादी बहुब्रीहि समास :- जिस बहुब्रीहि समास पूर्वपद उपसर्ग हो वह प्रादी बहुब्रीहि समास कहलाता है।
      जैसे :-
      • नहीं है रहम जिसमें = बेरहम
      • नहीं है जन जहाँ = निर्जन
      1. संयोगमूलक समास क्या होता है :- संयोगमूलक समास को संज्ञा समास भी कहते हैं। इस समास में दोनों पद संज्ञा होते हैं अथार्त इसमें दो संज्ञाओं का संयोग होता है।
      जैसे :- माँ-बाप, भाई-बहन, दिन-रात, माता-पिता।
      2. आश्रयमूलक समास क्या होता है :- आश्रयमूलक समास को विशेषण समास भी कहा जाता है। यह प्राय कर्मधारय समास होता है। इस समास में प्रथम पद विशेषण होता है और दूसरा पद का अर्थ बलवान होता है। यह विशेषण-विशेष्य, विशेष्य-विशेषण, विशेषण, विशेष्य आदि पदों द्वारा सम्पन्न होता है।
      जैसे :- कच्चाकेला, शीशमहल, घनस्याम, लाल-पीला, मौलवीसाहब, राजबहादुर।
      3. वर्णनमूलक समास क्या होता है :- इसे वर्णनमूलक समास भी कहते हैं। वर्णनमूलक समास के अंतर्गत बहुब्रीहि और अव्ययीभाव समास का निर्माण होता है। इस समास में पहला पद अव्यय होता है और दूसरा पद संज्ञा। उसे वर्णनमूलक समास कहते हैं।
      जैसे :- यथाशक्ति, प्रतिमास, घड़ी-घड़ी, प्रत्येक, भरपेट, यथासाध्य।
    • इस समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता। जब दो पद मिलकर तीसरा पद बनाते हैं तब वह तीसरा पद प्रधान होता है। इसका विग्रह करने पर “वाला , है, जो, जिसका, जिसकी, जिसके, वह” आदि आते हैं वह बहुब्रीहि समास कहलाता है।

    Kisi samas me vigrah pd aur vaky proyog pr nirbhar karta hai.

    kisi shabd ke aarmbh me rangvachi shabd aaye to vha bhi karmdhary hota hai .



    es prakar se bataya ki samas ke prakar aur sabke baare me .
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    Vikas Kumar Singh
    हेलो दोस्तों आप लोगो को मेरे ब्लॉग पर रोज नई नई पोस्ट पड़ने को मिलेगी मेरा मकसद है की मै अपनी जानकारी ज्यादा से ज्यादा लोगो शेयर कर सकूँ आप लोगो को मेरे ब्लॉग पर सभी प्रकार [शिक्षा ,तकनीक ट्रिक सोशल मीडिया , हेल्थ ,आदि ]की जानकारी पढ़ने को मिलेगी
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